रिश्तों के बदलते रंग
रिश्तों के बदलते रंग
लेख
रिश्तों के भी रंग बदलते है।समय के साथ गहरे भी होते और कहीं हल्के भी पड़ जाते। लेकिन इंसान अपने आपको रिश्तों से कभी आज़ाद नहीं कर पाता।पैदा होने के साथ ही इंसान बहुत से रिश्तों नातों से जुड़ता चला जाता।इस संसार में जन्म लेने से पहले ही एक शिशु अपनी माँ के साथ गर्भनाल से जुड़ा रहता। जन्म लेते ही एक अटूट रिश्ता माँ के साथ बन जाता बचपन के कुछ सालों तक तो बस माँ के आंचल के आसपास ही बच्चे की दुनिया होती है, फिर धीरे धीरे वो अपने नज़दीकी रिश्तों से पहचान बनाने लगता अपने पिता, भाई, बहन, दादा, दादी, नाना, नानी और परिवार में शामिल सभी लोगों के साथ पास और दूर का रिश्ता जुड़ता ही चला जाता। समय का पहिया जैसे जैसे आगे बढ़ता जाता इंसान घर से बाहर भी अपने वजूद को क़ायम रखने अनेक परिचित और अपरिचित चेहरों से रूबरू होता और कुछ लोगों से उसकी घनिष्टता बढ़ती जाती, उन्हें वह अपने मित्रों के श्रेणी में शामिल करता जाता। वैसे तो विद्यार्थी जीवन के दौरान ही मित्रों की सूची लम्बी होती जाती, जीवन के शैशव काल से किशोरवस्था में पदार्पण करते ही वह पारिवारिक रिश्तों के साथ ही बाहर निकल अपनी ही तरह के साथियों की तलाश शुरू कर देता। अब माँ के आंचल से बाहर निकल वह दोस्ती के रिश्ते अपने लिए बनाता है, अपनी सहूलियत और जरूरतों के मद्देनज़र वह अच्छे, बुरे सभी प्रकार के व्यक्तित्वों से टकराता है, उन्हें जानता, समझता, परखता है, पर इस उम्र में परिपक्वता का अभाव होने के कारण सच्चे रिश्तों को पहचानना कठिन भी हो जाता है।कुछ रिश्ते उसे आकर्षित तो बहुत करते पर सच की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। इसी तरह के अनुभवों से जीवन के प्रति उसके रिश्तों की समझ में इज़ाफ़ा होता जाता। बचपन से जुड़े कुछ अटूट रिश्ते माता पिता भाई बहन ये खून के रिश्ते सदा दिल के करीब होते परन्तु परिस्तिथिवश कभी कभी इन रिश्तों में कड़वाहट कुछ इस तरह घुलने लगती कि चाहकर भी मिठास क़ायम नहीं रह पाती। अपने घनिष्ठ मित्रों, जीवनसाथी और उसके साथ जुड़े रिश्तों में भी कहीं स्वाभिमान,अभिमान,दिखावे की झलक महसूस होने लगती तो जीवन नैराश्य से भरा प्रतीत होने लगता।
आप और हम सभी अपने जीवन में रिश्तों के इन बदलते पड़ावों से गुजरते है औऱ समय के साथ बदलते इस लगाव औऱ अलगाव को महसूस भी करते है।जब छोटे से थे तो माता पिता ही सारी दुनिया लगती थी उनके साथ ही खेलना, खाना, रूठना, मनाना उनकी ही नकल करना उनके जैसे ही बनने की कोशिश करते रहना पर बचपन से जवानी तक आते आते उनके प्रति हमारा व्यवहार बदलने लगता हमारे विचारों में भिन्नता आने लगती, हमारी पसंद उनसे अलग होती जाती, पीढ़ियों के अंतर के चलते हम जीने के अपने तौर तरीके अपनाने लगते और अपने जीवन में माता पिता की दखलअंदाज़ी एक हद तक ही बर्दाश्त कर पाते। उनकी प्रतिक्रिया और सुझाव भी कई बार नागवार गुजरने लगते। यह वैचारिक मतभेदता कई रिश्तों में खटास का कारण बनती और आपसी संबंध चाहे पारिवारिक हो या व्यवसायिक विचार और दृष्टिकोण में भिन्नता के चलते बनते बिगड़ते रहते।संबंधों के बीच पनपती गलतफहमियाँ और भावनात्मक लगाव की कमी भी रिश्तों में दरार पैदा करती।फिर भी सुकून पाने की चाहत में इंसान ताउम्र रिश्तों में अपना सा कोई तलाश करता। वह उन्हीं लोगों के बीच रहना पसंद करता जिनसे उसके सोच और विचार मेल खाते हो। क्यूंकि अपनी ख़ुशी,अपने गम, अपनी उपलब्धियां,अपनी उम्मीदें साझा करने उसे कोई न कोई साथी चाहिए और अगर रिश्ते ही नहीं बचेगे तो भावनाओं को जाहिर किस पर करेंगे।वैसे तकनीकी के विकास और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने भी रिश्तों का स्वरूप बदल दिया है, एक ही छत के नीचे रह रहे परिवार के सदस्य एक दूसरे के सुख दुख से अनभिज्ञ अपनी बनाई आभासी दुनिया में विचरण करते रहते।
आज के आधुनिक युग में रिश्ते कांच की तरह हो गये है, जरा सा आघात भी सहन नहीं कर पाते,जरा सी ठोकर से ही टूट जाते। अब पहले सी सहनशीलता भी नहीं रह गयी, मशीनीकरण का विकास होने के साथ ही मनुष्य भी भावनाविहीन होता जा रहा उसके लिए दूसरों की भावनाओं की कद्र करना उतना आवश्यक नहीं रह गया वह स्वार्थ के वशीभूत हो किसी भी रिश्ते को ताक पर रख प्रगति के नये सोपान चढ़ लेना चाहता। सुखसुविधा जुटाने की इस अंधीदौड़ में वह रिश्तों की कोमलता को भी कुचल भागता ही जा रहा। कर्तव्य नहीं बस अधिकारों के लिए लड़ने भिड़ने को तत्पर रहता। हाँ, मनुष्य की इसी सोच ने रिश्तों की हॅसती खेलती तस्वीरों में दरारे पैदा कर दी है। अपने अहं के आगे उसे सभी तुच्छ जान पड़ते वो किसी के लिए रुकना झुकना नहीं जानता उसे बस अपनी मंज़िलों का जूनून ऐसा है कि हर रिश्ता बस वस्तु की तरह इस्तेमाल करने के हुनर में पारंगत हो वह दुनिया पर राज़ कर लेना चाहता।जाने क्यों वह भूल जाता की उसे जानवर से मनुष्य यहीं संवेदनाएं बनाती जो वो अपने से जुड़े रिश्तों में भरता और वह कितना भी कामयाब क्यूँ न बन जाये गर रिश्तों को न जीत पाए तो सफलता का सुख भी नहीं पा सकता चाहे मन के रिश्ते हो या इंसानियत में ढले जिम्मेदारी भरे पड़ाव हो, रिश्तों के बिना तो जीवन अधूरा ही है। अपनी अपेक्षाओं का बोझ अगर इंसान कम कर दे प्रत्येक रिश्ते से तो खुशियों से भरे सुकून के हज़ारों पल तस्वीरों में कैद कर मुस्कुरा सकता।
#लेखमंथ प्रतियोगिता हेतु
स्वरचित एवं मौलिक
शैली भागवत "आस"✍️
इंदौर
Abhinav ji
28-Jun-2022 08:10 AM
Very nice👍
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Dr. Arpita Agrawal
27-Jun-2022 11:55 PM
वाह, बहुत सुन्दर 👌
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नवीन पहल भटनागर
27-Jun-2022 05:19 PM
बहुत खूबसूरत भाव लिखे आपने
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